क्या आपका बच्चा भी घंटों मोबाइल में बिजी रहता है, कैसे रखे दूर ?

बालोतरा न्यूज रूपेश प्रजापत
क्या आपका बच्चा भी घंटों मोबाइल में बिजी रहता है, कैसे रखे दूर ?
बच्चों के मोबाइल उपयोग के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव, पेरेंट्स कैसे करे इस समस्या का समाधान?


सिक्के की तरह ही हर चीज के दो पहलू होते हैं। एक अच्छा और एक बुरा। इसकी तरह सोशल मीडिया का बच्चों पर प्रभाव भी दो तरह से हो सकता है। जो कुछ हद तक अच्छा तो कुछ मामलों में सावधानी बरतने जैसा भी हो सकता है। तो चलिए जानते है आज के विशेष अंक मे गीतांजली पब्लिक स्कूल के प्रधानाध्यापक राजेंद्रसिंह हरियाणसा से की मोबाइल एवं सोशल मीडिया का बच्चों पर प्रभाव जो सकारात्मक एवं नकारात्मक तौर पर देखा जा सकता है जिसमे एक अभिभावक (मातापिता ) का क्या अहम् भूमिका रहती है।
आंकड़ों के मुताबिक 12 से 18 महीने की उम्र के बच्चों में स्मार्टफोन के इस्तेमाल की बढ़ोतरी देखी गई है। ये स्क्रीन को आंखों के करीब ले जाते हैं और जिससे आंखों को नुकसान पहुंचता है।आंखें सीधे प्रभावित होने से बच्चों को जल्दी चश्मा लगने, आंखों में जलन और सूखापन, थकान जैसी दिक्कतेे हो रही हैं। स्मार्टफोन चलाने के दौरान पलकें कम झपकाते हैं। इसे कंप्यूटर विजन सिंड्रोम कहते हैं। माता-पिता ध्यान दें कि स्क्रीन का सामना आधा घंटे से अधिक न हो। कम उम्र में स्मार्टफोन की लत की वजह बच्चे सामाजिक तौर पर विकसित नहीं हो पाते हैं। बाहर खेलने न जाने की वजह से उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता। मनोविशेषज्ञों के पास ऐसे केस भी आते हैं कि बच्चे पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर की तरह ही हरकतें करने लगते हैं। इस कारण उनके दिमागी विकास में बाधा पहुंचती है। बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल अधिकतर गेम्स खेलने के लिए करते हैं। वे भावनात्मक रूप से कमज़ोर होते जाते हैं ऐसे में हिंसक गेम्स बच्चों में आक्रामकता को बढ़ावा देते हैं। बच्चे अक्सर फोन में गेम खेलते या कार्टून देखते हुए खाना खाते हैं। इसलिए वे जरूरत से अधिक या कम भोजन करते हैं। अधिक समय तक ऐसा करने से उनमें मोटापे की आशंका बढ़ जाती है। फोन के अधिक इस्तेमाल से वे बाहरी दुनिया से संपर्क करने में कतराते हैं। जब उनकी यह आदत बदलने की कोशिश की जाती है तो वो चिड़चिड़े, आक्रामक और कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।
माता-पिता एक राय रखें। यदि मोबाइल या किसी और चीज़ के लिए मां ने मना किया है तो पिता भी मना करें। वरना बच्चे यह जान जाते हैं कि किससे परमिशन मिल सकती है। बच्चों का इमोशनल ड्रामा सहन न करें। अपने जवाब या राय में निरंतरता रखें। एक दिन ‘न’ और दूसरे दिन ‘हां’ न कहें। रोने लगें तो ध्यान न दें। बाद में प्यार से समझाएं।
इंटरनेट पर कुछ अच्छा और ज्ञानवर्धक है तो उसे दिखाने के लिए समय तय निर्धारित करें और साथ बैठकर देखें। स्मार्ट टीवी का इस्तेमाल कर सकते हैं इससे आंखों और स्क्रीन के बीच दूरी भी बनी रहेगी।
बच्‍चों का मन बहुत नाजुक और चंचल होता है और सोशल मीडिया आसानी से उनकी सोच और व्‍यवहार को बदल सकता है। छोटी उम्र में बच्‍चे अच्‍छे और बुरे में फर्क नहीं कर पाते हैं और पैरेंट्स होने के नाते आपके लिए यह जानना जरूरी है कि सोशल मीडिया का बुरा प्रभाव भी होता है। बच्‍चों पर सोशल मीडिया के कुछ ऐसे नकारात्‍मक प्रभाव हो सकते हैं :
सोशल मीडिया इतना बड़ा है कि बच्‍चा कहां, कब और कैसे क्‍या जानकारी ले, आप उसे कंट्रोल ही नहीं कर सकते हैं। ऐसी स्थितियां बच्चों को अश्लील, हानिकारक या ग्राफिक वेबसाइटों तक पहुंचा सकती हैं, जो उनकी सोचने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।
आजकल के बच्चों में बचपन से ही मोबाइल चलाने की आदत देखी जा रही है। इसका कारण
आपने देखा होगा कि आजकल छोटे-छोटे बच्चे भी दिनभर फोन से लगे रहते हैं। 2-3 साल के बच्चे भी मोबाइल पर गेम्स खेलने, वीडियोज देखने, वीडियो कॉल करने में इतने एक्सपर्ट होते हैं कि कई बार बड़े तक झेंप जाते हैं। मोबाइल फोन न देने पर बच्चों का गुस्सा करना, रोना, चीखना और चिल्लाना आपने भी देखा होगा। लेकिन क्या आपने सोचा है कि उनमें इस तरह की आदत शुरू कैसे होती है? जवाब बहुत आसान है- पेरेंट्स की गलतियों के कारण। आजकल बच्चों को बिजी रखने के लिए माता-पिता खुद ही उन्हें गेम्स और वीडियोज चलाकर दे देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मोबाइल या टैबलेट की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी बच्चों की आंखों के लिए बहुत नुकसानदायक हो सकती है।
माता-पिता की इन गलतियों के कारण बच्चों को लगती है मोबाइल की लत
रोते हुए बच्चे को शांत करने के लिए मोबाइल पर वीडियोज चलाकर दे देना।


बच्चा परेशान कर रहा है, तो उसे ऑनलाइन या ऑफलाइन गेम में उलझा देना।
बच्चों को टाइम न देना, जिससे बोर होकर बच्चे टीवी, टैबलेट्स और मोबाइल का इस्तेमाल बोरियत मिटाने के लिए करने लगते हैं।
बच्चों के सामने खुद भी हर समय फोन चलाना, वीडियोज देखना या सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना।
बच्चों के वीडियोज शूट करना और ऑनलाइन पोस्ट करना, जिससे बच्चे का मोबाइल, सोशल मीडिया की तरफ इंगेजमेंट बढ़ता है।
बच्चों को बाहर खेलने न जाने देना, जिससे बच्चे दिनभर घर पर रहते हैं और डिजिटल गेम्स से ही टाइमपास करते हैं।
आपने देखा होगा कि आजकल छोटे-छोटे बच्चे भी दिनभर फोन से लगे रहते हैं। 2-3 साल के बच्चे भी मोबाइल पर गेम्स खेलने, वीडियोज देखने, वीडियो कॉल करने में इतने एक्सपर्ट होते हैं कि कई बार बड़े तक झेंप जाते हैं। मोबाइल फोन न देने पर बच्चों का गुस्सा करना, रोना, चीखना और चिल्लाना आपने भी देखा होगा। लेकिन क्या आपने सोचा है कि उनमें इस तरह की आदत शुरू कैसे होती है? जवाब बहुत आसान है- पेरेंट्स की गलतियों के कारण। आजकल बच्चों को बिजी रखने के लिए माता-पिता खुद ही उन्हें गेम्स और वीडियोज चलाकर दे देते हैं।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल पर छपी रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार दिमाग के समुचित विकास के लिए जन्म से 5 साल तक की उम्र बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसी उम्र में बच्चे विचार करना, तुलना करना, लिखना, पढ़ना, नई भाषा सीखने, क्रिएटिविटी जैसी क्षमताएं विकसित करते हैं। ये क्षमताएं दिमाग के अंदर करोड़ों न्यूरॉन्स के कनेक्शन के कारण पैदा होती हैं। लेकिन मोबाइल की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी इन न्यूरॉन्स के कनेक्शन में बाधा बनती है, जिससे बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता है।
माता-पिता की इन गलतियों के कारण बच्चों को लगती है मोबाइल की लत
रोते हुए बच्चे को शांत करने के लिए मोबाइल पर वीडियोज चलाकर दे देना।
बच्चा परेशान कर रहा है, तो उसे ऑनलाइन या ऑफलाइन गेम में उलझा देना।
बच्चों को टाइम न देना, जिससे बोर होकर बच्चे टीवी, टैबलेट्स और मोबाइल का इस्तेमाल बोरियत मिटाने के लिए करने लगते हैं।
बच्चों के सामने खुद भी हर समय फोन चलाना, वीडियोज देखना या सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना।
बच्चों के वीडियोज शूट करना और ऑनलाइन पोस्ट करना, जिससे बच्चे का मोबाइल, सोशल मीडिया की तरफ इंगेजमेंट बढ़ता है।
बच्चों को बाहर खेलने न जाने देना, जिससे बच्चे दिनभर घर पर रहते हैं और डिजिटल गेम्स से ही टाइमपास करते हैं।
बाहर जाकर खेलने के लिए करें प्रेरित बच्चों के विकास के लिए बेहतर यही है कि वो बाहर जाकर खेलें। बाहर खेलते समय उछल-कूद के दौरान उनकी एक्सरसाइज हो जाती है। इसके अलावा दूसरे बच्चों के साथ खेलने से उनमें सोशल स्किल्स और लैंग्वेज स्किल्स भी बढ़ती हैं।
बच्चों के साथ बैठें, बात करें
अगर आप बच्चों पर ध्यान नहीं देंगे तो उनमें कुछ न कुछ गलत आदतें विकसित होंगी ही होंगी। इसलिए अपने बच्चों के लिए दिन में थोड़ा समय जरूर निकालें, जब आप उनके साथ बैठकर सुकून से बात कर सकें। इस फ्री टाइम में आप उनसे उनके दिनभर किए गए कामों के बारे में पूछ सकते हैं, उनके सवालों के जवाब दे सकते हैं।
बच्चों के सामने कम इस्तेमाल करें फोन
बच्चों की मोबाइल की लत छुड़ाने के लिए जरूरी है कि आप खुद भी उनके सामने मोबाइल का बहुत कम इस्तेमाल करें। कई बार बच्चे जब आपको फोन का इस्तेमाल करते हुए देखते हैं, तो वो भी फोन मांगने लगते हैं। आजकल बहुत सारे मां-बाप फ्री टाइम में भी सोशल मीडिया पर ज्यादा एक्टिव रहते हैं और बच्चों पर कम ध्यान देते हैं। इसलिए बच्चों के सामने जरूरी होने पर ही फोन चलाएं।

राजेंद्र सिंह हरियाणसा, प्रधानाचार्य गीतांजली पब्लिक स्कूल पचपदरा

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